ज्ञानवापी पर सुप्रीम कोर्ट ने डिसमिस कर हाई कोर्ट का ऑर्डर सही ठहराया।

Gyanvapi: ज्ञानवापी केस हम सब जानते ही रहे हैं कि ये बात लिखित एविडेंस है।औरंगजेब के टाइम के मासिर-ई-आलमगिरी या और उस समय के राइटर्स कहते हैं की औरंगजेब ने काशी के मंदिर को गिराने का आदेश दिया था। उस आदेश के बाद वहाँ सूचना भी आई थी कि मंदिर गिरा दिया गया है। अब इस एविडेंस के बाद उस पर मस्जिद का निर्माण कर वहाँ जो देवी देवताओं को दफन कर दिया गया। वहाँ भगवान विश्वेश्वर शिव का मंदिर और उनकी शिवलिंग को फव्वारा बना दिया गया।

अगर आप लगभग 100 वर्ष पहले मक्का की तस्वीर देखेंगे तो वहाँ चारो ओर पर पानी भरा हुआ है। वो तस्वीरें वायरल हो रही है जिसमें वहाँ पर पानी भरा हुआ है। अब सोचने की बात ये है की जो मक्का के काबा का पानी न निकाल पाए हों, वहाँ पानी निकालने की टेकनीक न हो वो हिंदुस्तान में उससे ३००-४०० वर्ष पहले वहाँ फव्वारा लगाते हैं। आप सोचिये की जिस समय मोटर आविष्कार ना हुआ हो। उस समय पर फब्बारा चल रहा था जब बिजली भी नहीं बनी थी। तो आप सोच सकते हैं की किस प्रकार से मनगढंत कहानियों गढ़ी जा रही है?

लेकिन बात यहाँ पर ये आई कि मुलायम सिंह के समय पर जिस मंदिर की दीवार पर बाहर जो मूर्तियां बनी थी, उन पर पूजा हो रही थी। उनको भी बंद करवा दिया गया और कहा गया कि रोज़ की पूजा की जगह है। शृंगारगौरी की 1 दिन की पूजा होगी। मुलायम सिंह की सरकार जाने के बाद अखिलेश यादव और उसके बाद योगी आदित्यनाथ जी की सरकार आई और केंद्र में मोदी जी की सरकार चल ही रही थी।

तब ज्ञानवापी के मामले में ऑनरेबल कोर्ट ने नीचे के लोअर कोर्ट पर सर्वे का आदेश दे दिया के इस प्रश्न को देख लो। जब सर्वे का आदेश दिया गया तो मामला फिर डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में गया। वहाँ से हाईकोर्ट में गया, फिर सुप्रीम कोर्ट में गया। सुप्रीम कोर्ट ने एक काम किया की एक सीनियर जज से सुनवा लेते हैं। जो केसेस चले वो इस बात के भी चले कि सर्वे नहीं होना चाहिए। कोर्ट में केस ही नहीं हो सकता है। इस बात में बने की जो प्लेसेस ऑफ वर्शिप फैक्ट है वो इस को रोकता है।

अब जब प्राइमर्स है ये पता लग गया की नहीं वहाँ वो तो मंदिर ही है तो फिर उस पर वैज्ञानिक सर्वे की बात आ गई। वैज्ञानिक सर्वे मतलब यह सर्वे एएसआइ करेगा। एएसआइ के सर्वे का भी मामला यहाँ से सुप्रीम कोर्ट चला गया और सुप्रीम कोर्ट से फाइनली नीचे आ गया और बाद में हाइकोर्ट ने ये कहा की नहीं वैज्ञानिक सर्वे तो करवाए बिना सर्वे करवाए। कैसे पता लगेगा वाकई में कौन सही है?

लेकिन जो इंतजामिया कमिटी है उसका लगातार एक आर्ग्यूमेंट है और वो ये के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट १९९१ जब तक है तब तक आप कुछ कर ही नहीं सकते। सर्वे भी करेंगे तो क्यों करेंगे? अभी सुप्रीम कोर्ट में वो मामला गया तो सुप्रीम कोर्ट में भी एक बात तो बिल्कुल साफ आयी की प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लगना भी है की नहीं लगना है।

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Credit: Wikipedia

प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट कब लगेगा?

प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लगने के लिए आजादी के समय पर जो जिसका करेक्टर था वह वहीं रहेगा। तो आजादी के समय पर उस स्थान का करेक्टर मंदिर था या मस्जिद का? ये भी बात डिस्प्यूट है तो बिना सर्वे होगा ही नहीं। वो तो वैज्ञानिक सर्वे करना पड़ेगा। वैज्ञानिक सर्वे में पता करना पड़ेगा की वो मन्दिर था कि मस्जिद थी। बाहर ऐसा तो नहीं मंदिर का बोर्ड लगा हुआ था। ये मस्जिद का बोर्ड लगा हुआ था।

हकीकत में १९४७ क्या था में ये भी पता किया जाएगा। तभी तो प्लेसेस ऑफ वर्शिप आवश्यक लगाए। जब आपके पास वस्तुस्थिति नहीं होगी तो फिर आप कैसे प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लगाएंगे? क्योंकि कोई भी कानून लगाया तभी जाएगा जब तथ्य तो सर्वे करके ही बताए जाएंगे।
इसलिए वैज्ञानिक सर्वे का आदेश दे दिए। हालांकि वैज्ञानिक सर्वे का जुलाई में ऑर्डर हुआ था। ऑगस्ट तक का टाइम दिया था। 5 अक्टूबर को कंप्लीट होना था। उसके बाद एएसआइ ने फिर से समय मांग लिया था की नवंबर 6 को जमा करेंगे।

नवंबर 6 को जब एएसआइ लोअर कोर्ट के सामने प्रेसेंट हुई तो एसआइ ने ये कहा कि हमने सर्वे कंप्लीट कर लिया। हम उस पर रिपोर्ट बना रहे हैं। इसलिए हमें थोड़ा और समय दे दिया जाए। ताकि हम रिपोर्ट बना सके। अब इसी विषय में जामिया कमेटी है जो मुस्लिम पक्ष है उसके अनुसार वो गलत है। हुआ क्या की? 2021 में ये जो सर्वे हो रहा है ये प्लेसेस ऑफ वर्शिप फैक्ट जो है उसके आधार पर जुडिक्शन ही चैलेंज हो गया। तो वो सिंगल जज की अदालत में लगा हुआ था।

सिंगल जज ने 2021 में सुनवाई करने के बाद जजमेंट कभी प्रनाउन्स नहीं किया। रिज़र्व कर लिया मई में उसके बाद फिर से वो फाइल 2022 में खोली की 22 में फिर सुनवाई होगी। उसी दर्ज ने करीब 2022 की सुनवाई के बाद 2023 में अभी फिर उन्होंने इस फाइल को खोल लिया और खोलने के बाद उन्होंने फिर सुनवाई कर ली।और सुनवाई करने के बाद जजमेंट रिज़र्व कर लिया।

इस निरीक्षण में, प्रशासनिक शक्ति मुख्य न्यायाधीश के पास होती है, जिसे 2013 में एक प्रशासनिक आदेश के माध्यम से स्थापित किया गया था। न्याय दिवाकर ने कहा कि जज जो 2021 तक केवल एक ही मामले को सुन रहे थे, अब वह फ़ाइलों के साथ काम कर रहे हैं। फ़ाइल को दो-तीन बार सुना गया है, लेकिन हर बार कोई निर्णय नहीं लिया गया। हालांकि, रोस्टर के बदलने के बाद, फ़ाइल स्वचालित रूप से किसी भी चरण पर उपलब्ध है। फ़ाइल को स्वचालित रूप से मुख्यमंत्री के पास आनी चाहिए, और मुख्य न्यायाधीश उन लोगों को भेजेंगे जिन्होंने पहले से ही मामले का आधा हिस्सा सुना है।

मुख्य न्यायाधीश ने अपने आदेश में लिखा कि क्योंकि हाई कोर्ट के विशेष न्यायाधीश के सचिव ने उस विशेष न्यायाधीश के कार्यालय के कर्मचारियों के प्रशासनिक आदेश के कारण फ़ाइल को वहीं रोक दिया था। हालांकि, उसके आदेश की कोई आवश्यकता नहीं थी, और वह ऐसा आदेश नहीं जारी कर सकते थे। इस प्रकार के आदेश जारी करने का अधिकार केवल और केवल मुख्य न्यायाधीश का होता है। अब, क्योंकि फ़ाइल वहीं रुकी थी, इसके अनुसार फ़ाइल वहां से लाई गई और लाने के बाद, वह फ़ाइल एक ही जज की बेंच से दूसरी बेंच में स्वरूप परिवर्तित कर दी गई।

ये बात इंतजामिया कमिटी को कुछ अच्छी नहीं लगी। उनका कहना है की सब सुनवाई हो चुकी है। आप जबरदस्ती जज बदल रहा है, लेकिन हाईकोर्ट ने अपना जस्टिफिकेशन दिया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने कहा की 11 और पैरा 12 अपने आप में कुछ कह रहा है और वो जो चीफ जस्टिस ने लिखा है इस एक्सप्लेनेशन के बाद अब आपके आर्ग्यूमेंट की कोई आवश्यकता ही नहीं है।

आप आर्ग्यूमेंट मत करिए, ज्यादा अच्छा होगा। क्योंकि ऑलरेडी रोस्टर चेंज हो चुका है और फाइल चुकी जानबूझकर वहाँ पर रोकी गई एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ के द्वारा या फिर सेक्रेटेरिएट के द्वारा।तो वो फाइल सेक्रेटरी को या ऐड्मिनिस्ट्रेटिव स्टाफ जो लड़ने जज का है वो उसको रोकने का अधिकार ही नहीं है, वो चीफ जस्टिस करेगा और चीफ जस्टिस ने वैसा ही किया।

ऐसी परिस्थिति में चीफ जस्टिस अगर वापस कर देता है तो यह ठीक नहीं होगा क्योंकि ऑलरेडी ऐड्मिनिस्ट्रेटिव है, उस पर ऐक्शन ले चूके हैं। पहले कुछ ना कुछ इसलिए अब डाउट क्रिएट होना स्वाभाविक है।या फिर ऐड मेल प्रैक्टीसेस स्वाभाविक है। इस मेल प्रैक्टीसेस को तोड़ना चाहिए। इसकी जिम्मेदारी बनती है। इसलिए इस मामले में प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू होगा या नहीं होगा।

वो लर्नड सिंगल जज भले ही सुनवाई कंप्लीट कर चुके हो, उनको अब उस फाइल को सुनने का अधिकार नहीं है और ये लोकली चीज़ ही तय करता है। ये सुप्रीम कोर्ट में नहीं करता।लोकल एडमिनिस्ट्रेटिव हेड है, चीफ जस्टिस होता है हाई कोर्ट का और उसने जो तय किया है उसका जो ग्राउंड बताया अगर उस ग्राउंड में कोई आपको लगता है डिस्क्रिप्षन सी है तो आप हमारी अदालत में सुनवाई करवाइए। अगर ग्राउंड में कोई फर्क नहीं है तो उस ऑर्डर की जिम्मेदारी चीफ जस्टिस हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की है।

इंतजामिया कमिटी को यह तथ्य पसंद नहीं आया कि सभी सुनवाइयां पहले ही पूरी हो चुकी हैं। उनका कहना है कि जबरदस्ती न्यायाधीश बदल रहे हैं, लेकिन हाईकोर्ट ने अपने निर्णय का स्पष्ट विवरण प्रस्तुत किया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उनके आदेश के पैरा 11 और 12 में स्वयं में काफी स्पष्टता है, और उनके आदेश को प्रस्तुत करने के बाद अब आपके तर्कों की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए तर्क देने की आवश्यकता नहीं है, यह बेहतर होगा।

इस संदर्भ में, यदि मुख्य न्यायाधीश इस आदेश को वापस लेते हैं, तो यह उचित नहीं होगा क्योंकि पूर्व में लिए गए कुछ निर्णयों की प्रामाणिकता के कारण, अब संदिग्धता उत्पन्न होना स्वाभाविक है। या फिर, इस मामले में प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के लागू होने की आवश्यकता हो तो उसे पालन किया जाना चाहिए। इसके जरिए, न्यायाधीश लर्नड सिंगल ने शायद सुनवाई पूरी की हो, लेकिन उन्हें अब वह फ़ाइल सुनने का अधिकार नहीं है, और यह यह स्थानीय विचारने का माध्यम प्रदान करता है।

इसे सुप्रीम कोर्ट में नहीं किया जाता। स्थानीय व्यवस्था का मुख्य अधिकारी होता है, और हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश होते हैं, और उन्होंने अपने निर्णय का समर्थन किया है। यदि आपको लगता है कि उस व्यवस्था की व्याख्या गलत है, तो आप हमारी अदालत में सुनवाई करवा सकते हैं। लेकिन यदि वह व्यवस्था में कोई भिन्नता नहीं है, तो उस आदेश की जिम्मेदारी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की होती है।”

इस मामले में किसी भी तरह की ग़लती नहीं हुई है। चीफ जस्टिस का ऑर्डर फाइनल है और अगर आपको लगता है कि नहीं, तो वो हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से पूछना चाहिए क्योंकि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के ऑर्डर में किसी प्रकार की कमी नहीं दिख रही है।

ऐडमिनिस्ट्रेटर ऑर्डर थ्रू 2013 के तहत किया जा रहा है, इसलिए हम इस पर कोई कार्रवाई नहीं ले सकते हैं और कोई नया आदेश भी नहीं जारी कर सकते। अगर आपको इस समस्या के समाधान में संदेह है, तो आपको उसी हाईकोर्ट में फिर से रिव्यू अपील दायर करनी पड़ेगी, और आपको उस आदेश को चुनौती देनी होगी।

इस मुद्दे पर मुकदमा चलाने वाले कोर्ट में, वही पक्ष शिकायत करने के लिए आगे आया है और चीफ जस्टिस की अदालत में शिकायत दर्ज की है, और उन्होंने कहा है कि फ़ाइल रोस्टर के बदलने के बावजूद, यह फ़ाइल ऐसे ही चल रही है और इसमें समस्या है, और लगता है कि ये एक न्यायाधीश उसे नहीं निर्धारित कर पा रहे हैं।

इस समस्या को दो साल से अधिक समय हो गया है। कई बार तो निर्णय रिजर्व हो जाता है, लेकिन निर्णय नहीं हो पा रहा है। इसलिए रोस्टर को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट रूल्स के अनुसार और जो उसकी परिणति हो रही है, उसको ध्यान में रखते हुए कृपया फ़ाइल को प्रोसीज़र के पास रोटेट कर देना चाहिए।

चीफ जस्टीस ने उनकी बात सुनी थी और उस पर आदेश भी दिया था, जिसको सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया। सुप्रीम कोर्ट ने सीधे इंतजामिया कमेटी को वापस हाईकोर्ट भेजा और कहा कि वे ही निर्णय लेंगे। क्योंकि हाईकोर्ट ने किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं किया है। हाईकोर्ट ने नियम का पालन किया है, इसलिए वे अपने सही मार्ग पर हैं। अगर आपको कोई आपत्ति है, तो फिर हाईकोर्ट में उसकी सुनवाई कराएं। उसमें फिर से निर्णय करने का काम होगा।

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